हैवान मूवी रिव्यू: अक्षय कुमार और सैफ अली खान अभिनीत यह फिल्म प्रियदर्शन की वही जानी-पहचानी शैलियों (genres) का मिश्रण है, जहाँ पहला हाफ एक निर्दोष व्यक्ति के जेल जाने की पृष्ठभूमि तैयार करता है और दूसरा हाफ अनजाने में एक हास्यास्पद पुलिस जांच (comic police procedural) में बदल जाता है।
हैवान मूवी रिव्यू: फिल्मों में ‘हैवान बनाम इंसान’ (दैत्य बनाम मानव) का वह पुराना संघर्ष ‘हैवान’ में नए रूप में देखने को मिलता है, जिसमें प्रियदर्शन ने अपनी ही 2016 की हिट मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ (Oppam) को रीमेक किया है। यहाँ सैफ अली खान दृष्टिहीन (दृष्टिबाधित) ‘श्याम’ की भूमिका में हैं, जो अक्षय कुमार के खूंखार ‘परशुराम’ के खिलाफ खड़े हैं। यह फिल्म काफी हद तक अपनी मूल फिल्म के प्रति वफादार रहती है।
प्रियदर्शन की दुनिया में मुख्य नायक और खलनायक हमेशा पूरी तरह से सही (सफेद) और गलत (काले) के खांचे में बंटे होते हैं, जिसमें जगह-जगह जबर्दस्ती ठूंसा गया हास्य (heavy-handed humour) भी शामिल होता है। यह मिश्रण उनकी कुछ फिल्मों में काम कर जाता है, खासकर उनकी तेज-तर्रार कॉमेडी फिल्मों में, जहाँ कलाकारों को पहाड़ियों से लटकने के साथ-साथ संवाद बोलने की जिम्मेदारी दी जाती है। ‘हैवान’ प्रियदर्शन की फिल्मों की वही जानी-पहचानी शैलियों का मिश्रण है, जिसमें टोन (माहौल) तेजी से बदलता है। पहला हाफ एक निर्दोष व्यक्ति को उस अपराध के लिए जेल भेजे जाने का ताना-बाना बुनता है जो उसने किया ही नहीं, और दूसरा हाफ अनजाने में एक हास्यास्पद ड्रामा बन जाता है।
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